https://youtube.com/shorts/ESGVfitcT4g?feature=share
फ्रांस में महंगाई के खिलाफ सड़कों पर उतरे लाखों लोग, हिंसक हुए प्रदर्शन; 1,200 से ज्यादा गिरफ्तार, मैक्रों सरकार पर बढ़ा दबाव
पेरिस: फ्रांस में बढ़ती महंगाई, महंगे ईंधन और सरकारी सेवाओं की बदहाल स्थिति को लेकर शुरू हुआ जनाक्रोश अब बड़े राजनीतिक संकट का रूप लेता दिखाई दे रहा है। शनिवार, 17 अक्टूबर को देश के कई शहरों में छात्र, कर्मचारी, ट्रेड यूनियन और येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोग सड़कों पर उतरे। कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। दुकानों में तोड़फोड़, आगजनी और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आईं।
फ्रांस के आंतरिक मंत्रालय के हवाले से आई रिपोर्टों के मुताबिक, शनिवार के राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों में करीब 5.5 लाख लोगों ने हिस्सा लिया। देर रात तक 1,200 से अधिक लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई, जबकि लगभग 150 पुलिसकर्मी घायल बताए गए। हिंसा की घटनाओं के बाद सरकार ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही है।
आखिर फ्रांस में क्यों भड़का इतना बड़ा विरोध?
फ्रांस में मौजूदा असंतोष की जड़ें केवल एक मुद्दे तक सीमित नहीं हैं। पिछले कुछ सप्ताह से छात्रों का आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर चल रहा था। इसके बाद महंगाई, ईंधन की कीमतों और आम लोगों की आर्थिक परेशानियों ने इस विरोध को व्यापक बना दिया।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च बढ़ रहा है, लेकिन उनकी आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। कर्मचारियों और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए घर चलाना मुश्किल होता जा रहा है। दूसरी ओर, शिक्षा और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं में संसाधनों की कमी को लेकर भी नाराजगी बढ़ी है।
17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों में अलग-अलग वर्गों के लोगों की भागीदारी इस बात का संकेत है कि असंतोष अब छात्र समुदाय तक सीमित नहीं रह गया है। हालांकि, सभी प्रदर्शनकारियों की मांगें एक जैसी नहीं हैं।
छात्र आंदोलन से शुरू हुई विरोध की नई लहर
फ्रांस में सितंबर के मध्य से छात्रों के प्रदर्शन तेज होने लगे थे। शुरुआत पेरिस के उपनगरीय इलाके क्रेतेय के एक स्कूल से जुड़े विरोध से हुई थी। छात्रों और शिक्षकों की शिकायतों में कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा विद्यार्थियों का होना, शिक्षकों की अनुपस्थिति, कर्मचारियों की कमी और स्कूलों की खराब आधारभूत सुविधाएं शामिल थीं।
धीरे-धीरे यह आंदोलन दूसरे शहरों तक पहुंच गया। सोशल मीडिया पर प्रदर्शन के वीडियो फैलने के बाद अधिक संख्या में छात्र इसमें शामिल होने लगे। कुछ स्थानों पर स्कूलों के बाहर प्रदर्शन और रास्तों की नाकेबंदी की घटनाएं भी हुईं।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग के साथ पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी विवाद बढ़ा। कुछ छात्र संगठनों और मानवाधिकार समर्थकों ने नाबालिग प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग पर सवाल उठाए। वहीं, पुलिस का कहना है कि हिंसक समूहों ने विरोध प्रदर्शनों की आड़ में सार्वजनिक संपत्ति और सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाया। <escape>[2]</escape>
येलो वेस्ट आंदोलन की वापसी ने बढ़ाई चिंता
फ्रांस में मौजूदा विरोध के बीच 2018 में चर्चा में आया ‘येलो वेस्ट’ आंदोलन भी फिर सक्रिय दिखाई दे रहा है। उस समय ईंधन कर में प्रस्तावित बढ़ोतरी और जीवन-यापन की लागत को लेकर शुरू हुए इस आंदोलन ने देशव्यापी राजनीतिक बहस छेड़ दी थी।
इस बार भी महंगे ईंधन और घटती क्रय शक्ति ने लोगों की नाराजगी को बढ़ाया है। 17 अक्टूबर के प्रदर्शनों में छात्र संगठनों के साथ मजदूरों, कर्मचारियों, किसानों और दूसरे सामाजिक समूहों की भागीदारी देखी गई।
येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोगों का तर्क है कि आर्थिक नीतियों का बोझ आम नागरिकों पर अधिक पड़ रहा है। उनका कहना है कि सरकार को महंगाई से राहत देने और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
पेरिस से मार्सेई तक हिंसा, कई इमारतों को नुकसान
शनिवार को फ्रांस के कई शहरों से हिंसा की खबरें आईं। राजधानी पेरिस में पुलिस ने कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस और पानी की बौछार का इस्तेमाल किया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की ओर बोतलें, पत्थर और आतिशबाजी के सामान फेंके। शहर के कुछ हिस्सों में दुकानों और वाहनों को नुकसान पहुंचने की खबर भी आई।
मार्सेई में प्रदर्शनकारियों का एक समूह नगर प्रशासन की इमारत में घुस गया, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की। लियोन में एक पर्यटन कार्यालय में आग लगाए जाने की सूचना मिली। लिमोज में नगर भवन में लगी आग से इमारत को भारी नुकसान पहुंचने की खबर आई।
पेरिस में कुछ मीडिया संस्थानों के कार्यालयों की खिड़कियां भी तोड़े जाने की जानकारी सामने आई। इन घटनाओं के बाद पुलिस की तैनाती बढ़ाई गई और संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा कड़ी कर दी गई।
हालांकि, हिंसक घटनाओं में शामिल समूहों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच अंतर करना जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्टें बताती हैं कि बड़ी संख्या में लोग अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, जबकि कुछ समूहों की गतिविधियों के कारण कई स्थानों पर हालात बिगड़े।
महंगाई और ईंधन की कीमतें बनीं बड़ा मुद्दा
फ्रांस में आर्थिक असंतोष की एक प्रमुख वजह आम लोगों की क्रय शक्ति को लेकर चिंता है। ईंधन, परिवहन और रोजमर्रा की जरूरतों पर बढ़ता खर्च उन परिवारों के लिए अधिक मुश्किल पैदा कर रहा है जिनकी आय सीमित है।
कुछ हालिया रिपोर्टों ने ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी को मध्य पूर्व में अमेरिका-इजरायल और ईरान से जुड़े युद्ध तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए व्यवधान से भी जोड़ा है। यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, फ्रांस में महंगाई की पूरी वजह केवल अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को नहीं माना जा सकता; घरेलू आर्थिक नीतियां और सार्वजनिक खर्च से जुड़े विवाद भी असंतोष का हिस्सा हैं।
प्रदर्शनकारियों की मांग है कि सरकार आम नागरिकों को आर्थिक राहत देने, जरूरी सेवाओं में निवेश बढ़ाने और सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए।
मैक्रों सरकार के सामने बढ़ती राजनीतिक चुनौती
फ्रांस में जारी विरोध ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू की सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। मैक्रों ने लोगों से शांति बनाए रखने और दूसरों के अधिकारों तथा संपत्ति का सम्मान करने की अपील की है। सरकार का कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हिंसा और तोड़फोड़ को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
प्रधानमंत्री लेकोर्नू ने हिंसक घटनाओं की निंदा की और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का संकेत दिया। दूसरी ओर, पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार को लेकर भी बहस जारी है।
फ्रांस में 2027 के राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों के बीच बढ़ता जन असंतोष राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है। दक्षिणपंथी और वामपंथी दल इस स्थिति को लेकर सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन उनके समाधान और राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
क्या फ्रांस में प्रदर्शन आगे भी जारी रहेंगे?
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि देशव्यापी विरोध कितने दिनों तक जारी रहेगा। छात्र समूहों और येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोगों ने सरकार से मांगें पूरी करने की अपील की है। वहीं, प्रशासन के सामने सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करने और हिंसा को रोकने की चुनौती है।
आने वाले दिनों में तीन बातें महत्वपूर्ण होंगी—क्या सरकार महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर कोई ठोस राहत पैकेज पेश करती है, क्या छात्र संगठनों और ट्रेड यूनियनों से बातचीत शुरू होती है और क्या पुलिस कार्रवाई को लेकर उठे सवालों की स्वतंत्र जांच होती है।
यदि आर्थिक परेशानियों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर समाधान नहीं निकलता, तो विरोध के दूसरे चरण की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन फिलहाल किसी नए देशव्यापी प्रदर्शन की तारीख या उसके आकार के बारे में निश्चित दावा करना जल्दबाजी होगी।
फ्रांस के मौजूदा संकट का व्यापक अर्थ
फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों ने एक बार फिर यह दिखाया है कि आर्थिक दबाव, सार्वजनिक सेवाओं में गिरावट की आशंका और सरकारी नीतियों से असहमति मिलकर बड़े सामाजिक आंदोलनों को जन्म दे सकती हैं।
मौजूदा स्थिति में सरकार के सामने दोहरी जिम्मेदारी है—लोगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करना और साथ ही हिंसा तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाली घटनाओं पर नियंत्रण रखना। इस संकट का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और प्रदर्शनकारी समूह बातचीत तथा नीतिगत बदलाव के रास्ते पर आगे बढ़ पाते हैं या नहीं।





