SIR पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- फॉर्म 6, 7 और 8 के नियमों में मनमाना बदलाव नहीं कर सकता चुनाव आयोग
रिपोर्ट- संतेश्वर वर्मा
दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान मतदाताओं के अधिकारों और फॉर्म भरने की प्रक्रिया पर अहम चर्चा हुई। अदालत ने चुनाव आयोग से सवाल किया कि जब कोई व्यक्ति पहले से मतदाता सूची में दर्ज है, तो उसे दोबारा पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 भरने की जरूरत क्यों पड़ रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग श्रेणियों के लिए निर्धारित फॉर्म की प्रक्रिया को इस तरह लागू किया जाना चाहिए, जिससे पात्र मतदाताओं को अनावश्यक परेशानी न हो।
सुनवाई के दौरान सामने आया कि ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 43 लाख नाम हटाए गए हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल बताए गए हैं, जिनके नाम अनुपस्थित पाए जाने या दूसरी जगह स्थानांतरित होने के कारण सूची में नहीं रहे। इस स्थिति को लेकर अदालत ने चुनाव आयोग से प्रक्रिया को अधिक व्यावहारिक बनाने और समयसीमा के बाद प्राप्त होने वाले फॉर्म पर विचार करने को कहा। आयोग ने इस संबंध में विचार करने का भरोसा दिया और जरूरत पड़ने पर 30 अक्टूबर की अंतिम तारीख बढ़ाने की संभावना भी जताई। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
पहले से पंजीकृत मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 पर सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 के इस्तेमाल पर सवाल उठाया। यह फॉर्म मुख्य रूप से नए मतदाता के पंजीकरण के लिए निर्धारित है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पहले से मतदाता सूची में शामिल है और केवल उसका पता बदला है, तो उसके मामले में फॉर्म-8 की प्रक्रिया अपनाने का विकल्प उपलब्ध होना चाहिए।
कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि पहले से पंजीकृत मतदाता से ऐसी घोषणा की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा, जिससे यह लगे कि वह पहले कभी मतदाता के रूप में दर्ज ही नहीं था। अदालत के अनुसार, काम या अन्य कारणों से किसी व्यक्ति का कुछ समय के लिए अपने निवास स्थान से बाहर रहना अपने आप में स्थायी रूप से स्थान बदलने का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
फॉर्म नहीं मिलने वाले मतदाताओं के लिए भी समाधान जरूरी
अदालत ने उन लोगों की स्थिति पर भी सवाल उठाया, जिन्हें मतदाता गणना फॉर्म मिला ही नहीं, जबकि वे अपने पते पर मौजूद थे। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में भी कोई व्यावहारिक व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि पात्र मतदाता प्रक्रिया से बाहर न रह जाएं।
सुनवाई के दौरान यह चिंता भी सामने आई कि यदि कोई व्यक्ति निर्धारित समय में फॉर्म जमा नहीं कर पाता, तो क्या उसे मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा। अदालत ने संकेत दिया कि अंतिम मतदाता सूची तैयार होने से पहले केवल देरी के आधार पर फॉर्म को अस्वीकार करने के बजाय उसके मामले पर विचार किया जाना चाहिए।
समयसीमा पर भी अदालत ने मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म जमा करने की अंतिम तारीख को लेकर भी चुनाव आयोग से सवाल किए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि जब दिल्ली में तत्काल कोई चुनाव प्रस्तावित नहीं है, तो समयसीमा को लेकर इतनी सख्ती क्यों बरती जा रही है।
वहीं, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने इस बात पर चिंता जताई कि समय पर फॉर्म जमा नहीं कर पाने वाले नागरिकों के मताधिकार पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने व्यवस्था में मौजूद ऐसी कमियों को दूर करने की जरूरत पर जोर दिया, जिनसे पात्र मतदाताओं को नुकसान हो सकता है।
आयोग ने बताईं अपनी तैयारियां
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से बताया गया कि मतदाताओं की सहायता के लिए शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। इसके अलावा बूथ लेवल अधिकारियों की तैनाती और घर-घर जाकर जानकारी जुटाने जैसी गतिविधियां भी चलाई जा रही हैं।
अब इस मामले में चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपना जवाब देना है। सुनवाई के दौरान उठाए गए सवालों का केंद्र यह रहा कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया के साथ पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए।




